जहां मैं खड़ी हूं
जहां मैं खड़ी हूं
वहां से कोई राह कहीं नहीं जाती
वो दौराहे, अजीब से मोड,
शोर में सनी गलियां, या नुक्कड़ की हो होड़
देखती हूं बेजान नजरों से
एक आह तक नहीं आती
जहां मैं खड़ी हूं
वहां से कोई राह कहीं नहीं जाती
एक अजीब खिंचाव है
एक सुकून एक पुकारसी भी
बंद आंखों में लगे
दुनिया सिमटी हुई भी
न जाने कौन
भीतर खींचता है
कोई आस या
चाह तक नहीं भाती
पौर्णिमा ढेरे

आपल्या लेखणीत एक वेगळीच शांत खोली आहे.
ReplyDeleteशब्द जणू कुठल्यातरी स्थिर, निःशब्द क्षणातून जन्मलेले—
बाहेरच्या गोंधळाला आणि आतल्या शांत हाकेचा
इतका सूक्ष्म ताण तुम्ही ज्या नेमकेपणाने पकडला आहे,
तो विलक्षण आहे.
तुम्ही भावना मांडत नाही…
त्या वाचकाला अनुभवायला लावता.
हेच एका संवेदनशील आणि परिपक्व लेखकाचे लक्षण असते.
Dhanyawad
DeleteReminds me of phir teri kahani yaad aayee song
ReplyDeleteबिन तेरे कोई आस भी ना रही इतने तरसे के प्यास भी ना रही|
Have you heard man kasturi re from Masaan?
DeleteLucid, yet thought provoking. But most striking perhaps is the image you can construct with words that describe something to abstract. I think that's super powerful!
ReplyDeleteThank you 🙏
Delete