क्यूँ?
चांगुलपणाचा प्रवास व्यावहारिक जगात टिकत नाही. आजुबाजुला दुहेरी माणसे बघितली की सावरलेला तोल सुटतो. माणसांच्या या भाऊगर्दीत श्वासही गुदमरतो. गर्दीत असून वैराण वाटते. मनात असूनही दुहेरी माणसांचा बुरखा फाडून त्यांना उघडे पाडता येत नाही.
क्यूँ करते हो आप मुझसे
कैसें हो? ये सवाल
जब जवाब सुनने के लिए
ना वक्त हैं ना हैं चाह
क्यूँ झूठ मूठ दिखावा
कुशल जानने के लिए
जब दिलको ठंडक पहुंचाये
मेरे दिलसे निकली आह..
बातचीत में दिलचस्पी दिखानेकी
क्यूँ लेते हो तकलीफ
जब दर्द हैं आपके लिए
मेरा अस्तित्वही..
क्यूँ कहूँ सुनू सुनाउ मै
बाते ये खोखली?
जब पहचानती हूँ के यहाँ
हर इक चेहरा है नकली..
मन से मन तक बातकी मैं हूँ आदी
आपको पसंद है दिमाग से दिल की बरबादी
अब देखना है आपको मैं कौन हूँ
अब जानना है, हूँ मै कैसी
या जांचना है हुई या नही
रुह बिन जिस्म सी !

वाह !वाह !!
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