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सफर

 गिरता रहा उठता रहा ढूंढता रहा खोता रहा दुनिया की मानदंड से खुद को नापता रहा मैं हूं सही या हूं गलत  या दुनिया सही या दुनिया गलत इस बवंडरमें गोते खाता रहा खुदको साबित करता रहा बदलती हवाओं के बदलती  रफ्तारोंसे   दामन हमेशा छुड़ाता रहा मैं खुद को बचाता रहा खींची हुई लकीरे दायरे सीमाएं खुद ही कि खुद से मिटाता रहा मैं खुद को पाता रहा बंद मुट्ठी से गुजरे समय को जो छोड़ा मैं असीम आनंद लुटाता रहा पौर्णिमा ढेरे